नहीं रहे पूर्व कैबिनेट मंत्री केदार सिंह फोनिया हमारे बीच

उरगम घाटी(लक्ष्मण सिंह नेगी)
जोशीमठ चमोली बद्रीनाथ विधानसभा के पूर्व कैबिनेट मंत्री उत्तराखंड उत्तर प्रदेश के केदार सिंह फोनिया हमारे बीच नहीं रहे । केदार सिंह फोनिया भारतीय जनता पार्टी के वह ऐसे विधायक थे जो सबसे पहले यहां से लगातार जीत दर्ज करते गए उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहते हुए जोशीमठ औली रोपवे लगाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई साथ ही जनपद चमोली को विकास की एक नई राह दिखाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई केदार सिंह फोनिया एक बेदाग छवि के राजनेता रहे जो बात एक बार कह दी वह लकीर बन जाती थी वह सीमांत गांव जोशीमठ के गमसाली के निवासी थे और दिल्ली पर्यटन विभाग में नौकरी करने के बाद वह उत्तराखंड उत्तर प्रदेश की राजनीति में जुड़ गए उनकी मृत्यु देहरादून के नेहरू कॉलोनी में हो गई है बताया गया है कि वे कई दिनों से बीमार थे और उन्होंने आज अंतिम सांस ली उनके द्वारा उत्तराखंड तीर्थ पर्यटन पर आधारित पुस्तक उत्तराखंड में विकास के आयाम सहित कई पुस्तकें उनके द्वारा लिखी गई । मानसरोवर यात्रा नीति माणा से शुरू करने के पक्षधर अपने कार्यकाल में कई बार शासन से बात भी की किंतु उनकी बात नहीं सुनी गरी उत्तराखंड केअंतरिम सरकार में जब उत्तराखंड राज्य बना 2000 में उस समय उनके मुख्यमंत्री बनने के सत प्रतिशत चर्चा थी किंतु रमेश पोखरियाल निशंक और केदार सिंह फोनिया की राजनीतिक महत्वाकांक्षा इतनी थी कि रमेश पोखरियाल निशंक ने रातों-रात बाजी पलट कर के नित्यानंद स्वामी को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा करवायी जब उत्तराखंड में भुवन चंद्र खंडूरी मुख्यमंत्री बने उस समय बद्रीनाथ के विधायक फोनिया थे उन्हें स्पष्ट वक्ता के रूप में जाने जाते हैं उस समय भी उन्होंने में स्पष्ट कहा कि जो विधान दल का नेता चुना जाएगा वह मुख्यमंत्री होगा उस समय भगत सिंह कोश्यारी के पक्ष में थे क्योंकि भगत सिंह कोश्यारी विधान सभा का सदस्य था दिल्ली दरबार के द्वारा सांसद भुवन चंद खंडूरी (अवकाश प्राप्त मेजर जनरल) को मुख्यमंत्री बनाया गया लगातार संघर्ष करते रहे उस समय सरकार के पास पूर्ण बहुमत नहीं था निर्दलीयों के सहारे सरकार चलाई जा रही थी चमोली और रुद्रप्रयाग कोटे से निर्दलीय विधायक नंदप्रयाग के राजेंद्र सिंह भंडारी को उस समय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया और केदार सिंह फोनिया मात्र विधायक रहे उत्तराखंड राज्य गठन के बाद चुनावी विधानसभा में उन्हें कोई मंत्री पद प्राप्त नहीं कर पाए उनकी यह पीड़ा अंतिम समय तक रही किंतु बेदाग छवि के कारण उन्हें आज भी याद किया जाता है। 2014 की चुनाव में हुए निर्दलीय चुनाव लड़े थे सरकार से नाराज होने के कारण रक्षा मोर्चा थे उन्होंने चुनाव का बिगुल फूंका था। वह उनका अंतिम चुनाव था उसके बाद उन्होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा।