चतुर्थ पंच केदार रुद्रनाथ हिमालय में जबरदस्त बर्फबारी
हिमालय के दिव्या एवं प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थान का नाम है रुद्रनाथ
लक्ष्मण सिंह नेगी की रिपोर्ट
ज्योतिरमठ (उरगम घाटी ) पंच केदार के चतुर्थ केदार रुद्रनाथ मै भगवान शंकर की मुखारविंद की पूजा पंच केदार में होती है शीतकालीन समय में रुद्रनाथ भगवान के कपाट बंद होते हैं भगवान रुद्रनाथ के बारे में मान्यता है कि हुए इन दिनों शीतकाल के समय में शंकर भगवान समाधि मैं विराजमान रहते हैं
हिमालय के दिव्या एवं प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थान का नाम है रुद्रनाथ अर्थात भगवान का रूद्र स्वरूप यहां दिखाई देता है यह स्थान समुद्र तल से 2290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। केदारखंड स्कंद पुराण में वर्णन मिलता है कि भगवान शंकर पार्वती से कहते हैं हे पार्वती यह स्थान रूद्रालय मेरा तुमसे भी प्राचीन है

यहां अप्रैल-मई में भगवान शंकर के कपाट खुलते हैं और अक्टूबर के अंतिम सप्ताह के लगभग यहां कपाट बंद हो जाते हैं अत्यधिक सुंदर और रमणीक स्थान होने के साथ-साथ यहां गुफा में भगवान शंकर का मुखारविंद है और यहां भगवान की मुखारविंद की पूजा की जाती है
भगवान के मुखारविंद को देखकर लगता है कि वह क्रोध में होंगे इसके बारे में मान्यता है जब दक्ष प्रजापति के यहां यज्ञ हो रहा था उस समय सती और भगवान शंकर इसी स्थान पर विराजमान थे सती ने भगवान शंकर से अपने पिता के यज्ञ में जाने की जिद की भगवान शंकर ने कहा सती बिना बुलावे कभी कहीं नहीं जाना चाहिए तुम्हारे पिता ने तुम्हें मुझे निमंत्रण नहीं दिया है सती नहीं मानी वह दक्ष प्रजापति के यज्ञ के लिए हरिद्वार कनखल चले गई सती की सभी बहनों उनके पति वहां आमंत्रित थे सभी देवगण मंडप में विराजमान थे किंतु भगवान शंकर का पूजा का भाग नहीं होने से सती बड़ी क्रोधित हुई और वह दक्ष प्रजापति से लड़ने लगी मेरे पति का भाग क्यों नहीं रखा गया दक्ष ने कहा कि उस शिव का नाम मैं नहीं लेना चाहता हूं सती क्रोधित हुई और उन्होंने पति के भाग को पूजा मंडप पर नहीं देखकर वह यज्ञ कुंड में भस्म हो गई यह सारी घटना जब शिव गणों ने रुद्रनाथ जाकर भगवान शंकर को बताया भगवान शंकर अत्यधिक क्रोधित हुए और उन्होंने अपनी जटा जूट खोल दी और उस जटा जूट से वीरभद्र पैदा किया ऐसी मान्यता है शिव के जटा खोलने से और जोर से मारने की आवाज रुद्रनाथ के सामने डुमक गांव तक गई डमाक शब्द से डुमक बना और वीरभद्र की स्थापना इसी गांव में की गई जिसे भगवान शंकर का पार्षद कहा जाता है रुद्रनाथ में भी शिवगण वीरभद्र का छोटा मंदिर है जिसे वजीर के नाम से भी जाना जाता है जब शंकर ने वीरभद्र पैदा किया और कहा कि जाओ हरिद्वार में जाकर दक्ष प्रजापति के यज्ञ को विध्वंस कर दो और दक्ष को आवश्यक हो तो उसका विनाश कर देना। यही हुआ वीरभद्र ने दक्ष राजा का यज्ञ विनाश के साथ-साथ उसका भी विनाश कर दिया उसके बाद कैलाश लौट आए शंकर का रूप शांत हुआ।
मान्यता है कि स्वयं ही शिव भगवान हरिद्वार आये
थे सती का आधा जला शरीर को लेने के लिए आज जला हुआ शरीर अपने कंधों मैं रख कर त्रिलोकी में भ्रमण करने लगे और कैलाश की ओर चल दिए तव देवताओं को मालूम हुआ भगवान शंकर ने सती के आधा जला हुआ शरीर को कंधे में धारण किया है तो नारायण ने हीं अपने सुदर्शन चक्र से सती के आजा जले शरीर को काटना शुरू किया जहां-जहां यह टुकड़े गिरे वहां वहां सिद्ध पीठ कहलाए। इसी दिन से पूरे भारत में शक्तिपीठ कहलाएं भगवान शंकर का यह पवित्र स्थान अपने में बड़ा दिलकश लगता है यहां हर वर्ष अप्रैल से लेकर अक्टूबर तक सैकड़ों प्रकार के फूलों का खिलना मिटाना आम बात है

प्रिय रोज, ब्लू पॉपी ,वत्सनाभ,कटकी,मासी, जय ,विजय ,टगर, फैन ,कमल ब्रह्म कमल, नीलकमल जैसे फूलों का फुलना मिटने का क्रम चलता रहता है। रक्षाबंधन के दिन रुद्रनाथ में भव्य मेले का आयोजन होता है। इस वर्ष वर्तमान में भगवान शंकर की गुफा के चारों और हिमा अच्छादित वातावरण बड़ा ही दिलकश नजारा आजकल दिखाई दे रहा है क्षेत्र के कुछ लोग मंदिर के सुरक्षा के लिए रुद्रनाथ हिमालय की ओर गए थे। कैसे पहुंचे और कब पहुंचे रुद्रनाथ रुद्रनाथ हिमालय के लिए हर वर्ष आप लोग अप्रैल-मई से अक्टूबर तक यात्रा कर सकते हैं आज भी यहां 19 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है खड़ी चढ़ाई के साथ-साथ बुगयाली रास्ता है कई मिलो तक पसरे घास के मैदान जिसमें पनार बुग्याल जो 4 किलोमीटर की परिधि से भी अधिक में फैला हुआ है। ऋषिकेश हरिद्वार से सीधा बस कार जीप से यहां गोपेश्वर सागर गांव तक मोटर मार्ग से पहुंचा जाता है जो लगभग 230 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है दूसरा रास्ता पंच केदार के कल्पेश्वर से पैदल कलगोठ डुमक तोली पनार पित्र धार होते हुए रुद्रनाथ लगभग 30 किलोमीटर के लगभग पैदल रास्ता तय कर यहां पहुंचा जाता है। रुद्रनाथ के लिए उरगम वैली से घोड़े पोर्टर गाइड मिल जाते हैं। जगह-जगह गांव में होम स्टे की व्यवस्था है। यहां यात्रा करने के लिए गर्म कपड़े की आवश्यकता होती है ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी हो जाती आवश्यक खाद्य सामग्री ले जाना आवश्यक है आवश्यक रूप से ही गाइड रखे तो अच्छा होगा। सागर से रुद्रनाथ वाले रास्ते में जगह-जगह दुकाने भी रहती है।